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अथर्ववेद 133.4

उ॒त्ता॒नायै॒ शया॒नायै॒ तिष्ठ॑न्ती॒ वाव॑ गूहसि ।
न वै॑ कमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥४॥

पूरा अध्याय