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सूक्त 129

129.1

खिलानि ।

ए॒ता अश्वा॒ आ प्ल॑वन्ते ॥१॥

129.2

प्र॒ती॒पं प्राति॑ सु॒त्वन॑म् ॥२॥

129.3

तासा॒मेका॒ हरि॑क्निका ॥३॥

129.4

हरि॑क्नि॒के किमि॑च्छासि ॥४॥

129.5

सा॒धुं पु॒त्रं हि॑र॒ण्यय॑म् ॥५॥

129.6

क्वाह॑तं॒ परा॑स्यः ॥६॥

129.7

यत्रा॒मूस्तिस्रः॑ शिंश॒पाः ॥७॥

129.8

परि॑ त्रयः ॥८॥

129.9

पृदा॑कवः ॥९॥

129.10

शृङ्गं॑ ध॒मन्त॑ आसते ॥१०॥

129.11

अ॒यन्म॒हा ते॑ अर्वा॒हः ॥११॥

129.12

स इच्छकं॒ सघा॑घते ॥१२॥

129.13

सघा॑घते॒ गोमी॒द्या गोग॑ती॒रिति ॥१३॥

129.14

पुमां॑ कु॒स्ते निमि॑च्छसि ॥१४॥

129.15

पल्प॑ बद्ध॒ वयो॒ इति॑ ॥१५॥

129.16

बद्ध॑ वो॒ अघा॒ इति॑ ॥१६॥

129.17

अजा॑गार॒ केवि॒का ॥१७॥

129.18

अश्व॑स्य॒ वारो॑ गोशपद्य॒के ॥१८॥

129.19

श्येनी॒पती॑ सा ॥१९॥

129.20

अ॒ना॒म॒योप॑जि॒ह्विका॑ ॥२०॥

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