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अथर्ववेद 125.1

अपे॑न्द्र॒ प्रा॑चो मघवन्न॒मित्रा॒नपापा॑चो अभिभूते नुदस्व ।
अपोदी॑चो॒ अप॑ शूराध॒राच॑ उ॒रौ यथा॒ तव॒ शर्म॒न् मदे॑म ॥१॥

पूरा अध्याय