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अथर्ववेद 35.1

ये भ॒क्षय॑न्तो॒ न वसू॑न्यानृ॒धुर्यान॒ग्नयो॑ अ॒न्वत॑प्यन्त॒ धिष्ण्याः॑ ।
या तेषा॑मव॒या दुरि॑ष्टिः॒ स्विऽष्टिं न॒स्तां कृ॑णवद् वि॒श्वक॑र्मा ॥१॥

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