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अथर्ववेद 9.2

उत् ति॑ष्ठत॒ सं न॑ह्यध्वं॒ मित्रा॒ देव॑जना यू॒यम्।
संदृ॑ष्टा गु॒प्ता वः॑ सन्तु॒ या नो॑ मि॒त्राण्य॑र्बुदे ॥२॥

पूरा अध्याय