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अथर्ववेद 4.18

इन्द्रो॑ जघान प्रथ॒मं ज॑नि॒तार॑महे॒ तव॑ । तेषा॑मु तृ॒ह्यमा॑णानां॒ कः स्वि॒त् तेषा॑मस॒द् रसः॑ ॥१८॥

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