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अथर्ववेद 34.4

मधो॑रस्मि॒ मधु॑तरो म॒दुघा॒न्मधु॑मत्तरः ।
मामित् किल॒ त्वं वनाः॒ शाखां॒ मधु॑मतीमिव ॥४॥

पूरा अध्याय