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अथर्ववेद 18.2

निरर॑णिं सवि॒ता सा॑विषक् प॒दोर्निर्हस्त॑यो॒र्वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा।
निर॒स्मभ्य॒मनु॑मती॒ ररा॑णा॒ प्रेमां दे॒वा अ॑साविषुः॒ सौभ॑गाय ॥२॥

पूरा अध्याय